
“पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान” इस कहानी में एक जोशीले ड्राइवर की कथा के बहाने उस दौर के गँवई परिवेश का खाका खींचा गया है…
इस कहानी में एक जोशीले ड्राइवर की कथा के बहाने उस दौर के गँवई परिवेश

इस कहानी में एक जोशीले ड्राइवर की कथा के बहाने उस दौर के गँवई परिवेश

हमारे एक सहपाठी थे। वे अभिभावकों को अपने परीक्षा-परिणाम का ठीक विपरीत फल बताते थे।

स्कूली शिक्षा में तब गणित का भय बहुत सताता था। एक समूची पीढ़ी इस भय

अब हम 6 लोग अपने गांव कलाग जाने के लिए उस बड़ी पहाड़ी के संकरे

चार-पाँच दशक पहले अधिकांश भारत गाँवों में बसता था। साधन कम होने के बावजूद लोगों

भिटौली के इंतजार में इस महीने अपने ससुराल में बेटी अपने पिता या भाई के

लेकिन मैं यह चाहता था कि जब हम बहुत ज्यादा प्यासे हो तब इस कोल्ड्रिंग

बुरा न मानो होली है! भई क्यों मानना बुरा, और अगर मान भी गए तो

यह कहानी गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है। उदारीकरण से पहले के भारत में ग्रामीण क्षेत्रों

यूं तो होली समूचे भारत में धूमधाम से मनाया जाने वाला त्यौहार है . जो