उत्तराखंड: दिल्ली की नौकरी छोड़ी, गांव लौटकर शुरू किया ट्राउट पालन; अब हर महीने 60 हजार तक कमाई

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बागेश्वर। पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में ट्राउट मत्स्य पालन ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार का एक अच्छा माध्यम बनकर सामने आ रहा है। विभागीय योजनाओं, तकनीकी मदद और स्थानीय जल संसाधनों के इस्तेमाल से जिले के कई लोग ट्राउट उत्पादन और इससे जुड़े कारोबार से अपनी आय बढ़ा रहे हैं।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में संचालित योजनाओं के तहत मत्स्य पालकों को विभाग की ओर से सहयोग दिया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने के साथ ही युवाओं को रोजगार के लिए गांव से बाहर जाने के बजाय स्थानीय स्तर पर काम करने का अवसर मिल रहा है।

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गांव लौटकर शुरू किया ट्राउट से जुड़ा काम

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बागेश्वर विकासखंड के ग्राम सानिउडियार निवासी चन्द्रशेखर इसकी एक मिसाल हैं। उन्होंने वर्ष 2016 में होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के बाद दिल्ली के एक होटल में कुक के रूप में नौकरी की। वर्ष 2019 में उन्होंने नौकरी छोड़कर गांव लौटने का फैसला लिया और मत्स्य पालन को अपना स्वरोजगार बना लिया।

वर्ष 2021-22 में विभाग की ओर से मोबाइल फिश वैन मिलने के बाद चन्द्रशेखर ने ट्राउट से तैयार व्यंजनों की बिक्री भी शुरू की। वर्तमान में उन्हें इससे हर महीने करीब 55 से 60 हजार रुपये की आय हो रही है। उनके काम से दो अन्य लोगों को भी रोजगार मिला है।

10 साल से ट्राउट उत्पादन से जुड़े चन्दन सिंह

कपकोट विकासखंड के ग्राम जगथाना निवासी चन्दन सिंह भी पिछले करीब 10 वर्षों से ट्राउट मत्स्य उत्पादन से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में वह हर साल करीब 35 कुंतल ट्राउट का उत्पादन कर रहे हैं। उनके माध्यम से करीब 30 लोगों को रोजगार से जोड़े जाने की जानकारी दी गई है।

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चन्दन सिंह के ट्राउट उत्पाद की मांग आईटीबीपी और एसएसबी के अलावा विभिन्न होटल और रेस्टोरेंट में भी बनी हुई है। इससे उन्हें स्थानीय स्तर पर बाजार उपलब्ध हो रहा है और ट्राउट पालन से जुड़े दूसरे लोगों को भी प्रोत्साहन मिल रहा है।

लीती गांव की समिति ने कमाया करीब 8 लाख रुपये

ग्राम लीती में गठित प्राथमिक मत्स्य जीव सहकारी समिति के माध्यम से भी ग्रामीण ट्राउट पालन कर रहे हैं। समिति में 15 सदस्य सक्रिय रूप से मत्स्य पालन से जुड़े हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत समिति के लिए 10 रेसवे तैयार किए गए हैं।

समिति ने मार्च 2026 तक करीब 16 कुंतल ट्राउट का उत्पादन किया। इससे समिति को लगभग 8 लाख रुपये की आय होने की जानकारी दी गई है।

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गांव में रोजगार और आय का बढ़ रहा आधार

बागेश्वर में ट्राउट मत्स्य पालन से जुड़े ये उदाहरण बताते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं। इससे ग्रामीण युवाओं को अपने गांव में ही कमाई का जरिया मिल रहा है।

ट्राउट पालन से उत्पादन, बिक्री और उससे जुड़े दूसरे कामों में रोजगार के अवसर बनने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिल रही है। विभाग का कहना है कि ऐसे प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के साथ आत्मनिर्भरता और रिवर्स पलायन की दिशा में भी मददगार साबित हो सकते हैं।

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