अब हम 6 लोग अपने गांव कलाग जाने के लिए उस बड़ी पहाड़ी के संकरे रास्ते से आगे चलने लगे, हम उस बुजुर्ग महिला के हौसले को देख कर दंग थे जो हम जवान युवाओ से तेज और फुर्ती से पहाड़ में चढ़ रही थी ,, बचपन से शादी होने तक वो बुजुर्ग महिला इसी गॉव में रही तो उनके लिए ये आम बात थी ,, पर हम तो मानो केवल पैदा यहाँ हुवे , आंखे हमने पलायन कर मैदान में खोली , तभी हमे ये पहाड़ी , शंकरे रास्ते , ओर पहाड़ की जिंदगी बड़ी संघर्षसील और कठिन परिश्रम वाली लग रही थी , उस वक्त हम ये भूल गए कि हमारे माता पिता, दादा दादी व पूर्वज इतनी परेशानी व कठिनाई रोज झेलते होंगे , पर हमें अभी अपनी कोल्ड्रिंग गिरने का दर्द और कई सालों बाद एक दिन की चढ़ाई मानो दुनिया का सबसे कठिन परिश्रम व यादगार दिन लग रहा था ,
यात्रा वृतांत का पढ़िए प्रथम भाग

पर ये यहां के एक एक छोटे बच्चे की रोज की कहानी थी ,, बरहाल ये सब सोचते सोचते हम चढ़ाई में 1 किलोमीटर चढ़ने के बाद फिर जंगल किनारे डेंजर जोन (यानी पहाड़ी इलाको में भी सबसे सवेदनशील संकरा क्षेत्र जिसके दूसरी तरफ गहरी खाई हो )का इलाका शुरू हुआ, जिसमें खाई वाली तरफ 3 फीट की पत्थर की दीवार की चिनाई (निर्माण) की गई थी साथ में उसके तारबाड़ भी किया गया था लगभग एक डेढ़ किलोमीटर इस लंबी दीवार के बारे में जब मैंने अपने साथ चल रही बुजुर्ग महिला से पूछा तो उन्होंने इस दीवार के पीछे की दुख भरी कहानी बताई उन्होंने बताया कि पिछले वर्षों में कलाग ग्राम सभा के दो लोग इस डेंजर जोन यानी हमारे गांव तक पहुंचने के लिए पहाड़ी के एकदम किनारे डेढ़ फिट बने चौड़े संकरे रास्ते से पैर फिसल कर अकाल मौत के मुंह में समा समा गए , उसके बाद ही ग्राम सभा के लोगों के संघर्ष के बाद बदौलत इस दीवार का निर्माण कराया गया पहाड़ी में दीवार के किनारे ज्यादा चढ़ाई नहीं थी, समानांतर रास्ते पर अब हमें थकान महसूस कम हो रही थी लिहाजा हमारी पैदल चलने की गति में भी थोड़ा तेजी आई, और तकरीबन आधे घंटे बाद हम उस छोर पर पहुंच गए जहां से जंगल की पहाड़ियां खत्म होकर गांव के खेतों की पगडंडियां दिखाई देने लगी ,
यात्रा वृतांत का पढ़िए द्वितीय भाग

पानी की प्यास से विरक्त हुए हम 6 लोग गांव के सीडी नुमा खेत देखकर खुश हुए क्योंकि हमारे साथ चल रही बुजुर्ग महिला ने बताया कि कुछ ही दूरी बाद तीन नौले( पहाड़ो में पानी के प्राकृतिक स्रोत को एक जगह एकत्र करने वाले बड़े सीडी नुमा आकर के गड्ढे को नौला कहा जाता है ) है जिनमें हमको पीने का प्रयाप्त पानी मिलेगा, पानी का नाम सुनकर कड़ी धूप में हमारे अंदर जान में जान आयी, कुछ दूर सीडी नुमा खेतों में चलकर हम उस स्थान पर पहुंच गये जहां प्राकृतिक स्रोतों के तीन अलग-अलग नौले बनाए गए थे जिनमें दो नौले एक जगह बने थे और एक नौला अलग से बना था, नौले के पास पहुंचते ही हमारे साथ आधे रास्ते से जुड़े हडबाढ़ क्षेत्र के तीन लड़के मुंह खुजाते हुए नौले के अंदर मानो इतनी तेजी से अपनी गर्दन ले गए कि अंदर डुबकी लगाने का मन हो, पर जितनी गति से उन तीन लड़कों ने नौले के अंदर गर्दन डाली उतनी ही तेजी से बाहर निकाल कर उस बुजुर्ग महिला से कहने लगे ( काखि या तो पाणी एक बूद लै ना) चाची यहा तो पानी की का एक बूद भी नही है
यात्रा वृतांत का पढ़िए तृतीय भाग

ये सुनकर बुजुर्ग महिला तमतमाई और बैग सर में डाल बारी बारी से नौले तलाशने लगी , उनको नौले तो खाली मीले लेकिन एक तेल का कनस्तर पानी से भरा मिला (पहाड़ो में जब सरसो के तेल के टीन खाली होते है तो उसे नौले से घर तक पानी ढुलाई का काम किया जाता है , पहले इस तेल के कनस्तर की जगह गागर यानी तांबे की गगरी भी इस्तेमाल होती थी जिसका प्रचलन अब कम होता जा रहा है )
यात्रा वृतांत का पढ़िए चतुर्थ भाग


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