गृह प्रवेश करते ही माँ ने तीखा सवाल दागा- क्या तुम भंग पीकर आये हो? (कथा)…

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भाँग (मरजुआना) हमारी परंपरा में प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। अगर यह आदत में शुमार हो  जाए तो एक सामाजिक बुराई के रुप में सामने आती है। इस कथा में कुछ घटनाओं के माध्यम से इसके दुष्प्रभावों का चित्रण किया गया है।

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भंग- प्रसंग
लोक मान्यता के अनुसार भाँग के पौधे को भगवान शिव कैलाश क्षेत्र से लाए थे। लोकमान्यता यह भी है कि गौतम सिद्धार्थ को छह दिवसीय साधना में भाँग के एक बीज राशन पर निर्भर रहना पड़ा था। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस ने पूरब में भाँग के प्रचलन का संक्षिप्त सा उल्लेख किया है।

चीनी यात्री ह्वेनसाँग को उसके यात्रामार्ग में पड़ने वाले मठ-मंदिरों में भंग के विविध प्रयोग देखने को मिले। आयुर्वेद-ग्रंथों में इसका उल्लेख औषधीय पादप के रूप में हुआ है। पुरातन काल में संत समागम  में भंग की अल्प मात्रा ध्यान को एकाग्र रखने में सहायक मानी जाती थी। इसीलिए संस्कृत भाषा में इसे ‘ विजया’ की संज्ञा से जाना गया।

इस अंचल में महाशिवरात्रि पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। वीरभद्र मंदिर के मुखालिंग का अभिषेक श्रद्धालुगण पूर्ण श्रद्धा के साथ करते हैं। लोक मान्यतानुसार राजा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने के लिए वीरभद्र का आविर्भाव इसी स्थल पर हुआ था। मंदिर पुरातात्त्विक महत्त्व का है।
          पुरातत्वविद् एनसी घोष के नेतृत्व में हुए उत्खनन में इस स्थल से कुषाणकालीन सिक्के व मृत्तिका पात्र प्राप्त हुए। यहाँ पर मानव-सभ्यता व संस्कृति की सतत विद्यमानता के प्रमाण पुरातत्ववेत्ताओं को प्राप्त हुए हैं। इतिहास में गुप्तकाल में प्रमुख शैवतीर्थ के रुप में इस स्थल का उल्लेख प्राप्त होता है। ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत में इस स्थल में मठ-मंदिरों का उल्लेख मिलता है। मंदिर में स्थापित त्रिमुखालिंग भगवान शिव के सौम्य रूप का द्योतक है।

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एक बार इस पर्व के अवसर पर हमारे चचेरे भाई मेला देखने गए। शिवार्चन के पश्चात् उन्होंने मेले-ठेले की रौनक देखी। मार्च के महीने में आयोजित होने वाले इस मेले में दोपहर तक अच्छी-खासी धूप खिलती है। किसी ने प्रोत्साहन दिया और हमारे बंधुओं ने कंठ भिगाने के लिए हरे द्रव्य का सेवन कर लिया। हरे रंग के मीठे द्रव्य से उनकी प्यास बढ़ती चली गयी। ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता गया। प्यास बुझाने के लिए उन्होंने एक बड़े पात्र को खाली कर दिया।
       घड़ी दो घड़ी में विजया ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया। उन्हें भय सताने लगा। एक कोने में धूनी रमाकर बैठ गए। डरते-डरते गिरते-पड़ते वे सायँकाल तक बमुश्किल अपने किराए के घर में पहुँच सके।

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भंग के पश्च-प्रभाव मे एक मान्यता यह है कि इसका सेवन मस्तिष्क पर व्यापक एवं विपरीत प्रभाव डालता है। वह हँसी, दुःख, भय अथवा उदासी में से किसी भी एक भाव को सघन कर देता है।

     तो बंधुओं की हास्य-भावना चरम पर थी। वाक्य छोड़ वे शब्दारंभ में ही हास प्रकट करते जा रहे थे। रात के खाने की तैयारी में रोटी बेल रहे थे और एक ही रोटी को पचासों बार बेलते जा रहे थे। लगे हाथ अट्टहास की प्रस्तुति भी देते जा रहे थे। तवे की आँच रोटी को कुछ ज्यादा ही भा रही थी। सो घंटे भर से तवे पर एक रोटी चढ़ी थी और एकनिष्ठ व समर्पण भाव दिखाते हैं अपने संबंधों से जरा भी नहीं पलट रही थी।

पचास बार बेली हुई रोटी चकले पर सवार होकर आत्मीयता प्रदर्शित कर रही थी। घंटा भर बीतने के बाद भी रोटी की टोकरी खाली थी। बंधु अपनी ही धुन में थे। वे तो बस रोटी ही बेले जा रहे थे। पुरापाषाण कालीन मानव की परंपरा में वे कच्चा भोजन ग्रहण करने को उत्सुक से दिख रहे थे।

तभी उनका अट्टहास सुनकर उनके हितैषी एक पड़ोसी का कक्ष में प्रवेश हुआ। हितैषी ने उन्हें सतर्क करते हुए खबरदार किया कि आपके चाल-चलन से संभवतः मालिक-मकान कल प्रातः आपका सामान सहित सड़क तक निर्यात संपन्न कर दे। यह सूचना देकर वह नेपथ्य में चला गया। यह सूचना पाकर यकायक उनकी भंगिमा बदल गई। अब  उनका  भय का भाव सघन हो उठा।

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भय का भाव उदित होते ही हास्य-भाव विलीन हो गया। उनके मस्तिष्क में तीन शब्दों ने गहन प्रभाव छोड़ा- मकान-मालिक… कल सुबह… सड़क पर..। इन शब्दों की अनुगूँज उनके मस्तिष्क पर स्थायी रूप से अंकित हो गयी। पूरी रात डर-डरकर काटी। अगले दिन वे भयभीत रहे और बिस्तर में दुबके रहे। शाम तक हितैषी ने उन्हें दही-सेवन कराया। तब जाकर वे इस चराचर जगत में वापस लौटे।
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हमारे एक मित्र ने पावन पर्व के अवसर पर प्रचुर मात्रा में प्रसाद ग्रहण किया। भंग की पकौडियाँ माया-मृग सी चित्ताकर्षक लगती हैं। सलीके से छानी गयी हों, तो इंद्रिय-निग्रह करना कठिन हो जाता है। भंगातिरेक से उनकी काया समस्त गतियाँ संपन्न कर चुकी थी।
 अकस्मात् उनकी चिंतन-प्रक्रिया अस्तित्ववाद, मृत्युबोध जैसे दार्शनिक विषयों पर केंद्रित हो गयी (जो क्रमशः मृत्युबोध पर जाकर अटक गयी।)

अपनी अंतिम इच्छा के रुप में इन्होंने स्मित हास्य की मुद्रा में परिजनों से गुनगुना पानी पीने को माँगा। उनका गला बुरी तरह सूखता जा रहा था। घर वालों ने इसे मजाक समझा। भंग के प्रभाव में जानकर उनकी अंतिम इच्छा सुनी तक न गयी। चिंतन प्रक्रिया में वे बार-बार अंतिम इच्छा गुनगुना पानी माँगते रह गए। प्रकट में उन्होने एकाध बार अवश्य पानी माँगा। यहीं पर डिफरेंस शुरू हुआ। जो होश में थे, उन्होंने तो एक ही बार सुना। इधर वैचारिक प्रक्रिया में वे सैकड़ों बार पानी माँग चुके थे।

जब उनकी गुनगुने पानी की तुच्छ सी माँग की सुनवाई तक न हुई तो वैचारिक क्षितिज पर सहसा उन्हें यकीन हो आया कि वे मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं। फलस्वरुप उनके आर्तनाद को सुनने में परिजन असमर्थ हैं। नहीं तो क्या वे अपने लाडले को एक गिलास पानी का नहीं देते। उन्हें पक्का विश्वास हो गया कि सूक्ष्म शरीर शेष रह जाने पर दुनियावी लोग उसे नहीं देख पाते।

  दुनियावी लोग मूर्त व्यक्ति से ही व्यवहार कर  सकते हैं, सूक्ष्म एवं पारदर्शी शरीर से नहीं। जीवात्मा को तो सब कुछ दृष्टिगोचर होता है। जीवित व्यक्तियों को यह सुविधा सुलभ नहीं। उन्होंने टॉलस्टॉय की कहानी ”इवान इलिच की मौत’ पढ़ी हुई थी। बस उसके कथानक का साम्य अपने साथ घट रहे घटनाक्रम से भिड़ाने लगे।

       कहानी के प्लॉट का एक हिस्सा ग्रहणकर वे अपने सूक्ष्म शरीर को लेकर स्नानागार में चले गए। घर वालों ने उसे देखा तो था, लेकिन सोचा जा रहा होगा। जाने दो। कहने का मतलब है, उसे कोई बाधा नहीं दी। तरंग-प्रभाव में वे परिजनों की उपेक्षित दृष्टि को अदृश्य विधान मान बैठे। उन्होंने मन में बिठा लिया कि अब मैं इन्हें नहीं दिख रहा हूँ क्योंकि मैं तो सूक्ष्मजीव बन चुका हूँ। मैं इन्हें कैसे दिख सकता हूँ। स्नानागार में उनके सूक्ष्म शरीर ने वस्त्र भिगो दिए। वे अपने कक्ष में आकर आँखें बंद कर उस लोक की यात्रा अनुभव कर रहे थे।
उनकी चिंतन-प्रक्रिया के दौरान ही परिवार के किसी सदस्य ने उनके भीगे वस्त्रों को चेंज कर लिया। इधर वे अपने सूक्ष्म शरीर के साथ उस लोक की यात्रा में लीन थे। इयान वीज कृत ‘सेम सोल मैनी बॉडीज’ के दृश्य से साम्य रखते हुए  बादलों के ऊपर सैर कर रहे थे। साथ ही धर्म-कर्म कर लेखा-जोखा भिड़ा रहे थे। लगे हाथ संचित कर्म की पूँजी का आकलन भी करते जा रहे थे।

उस दौर में एक ओर मुर्गी चोरी बड़ा तुच्छ किस्म का सामाजिक अपराध माना जाता था, तो दूसरी ओर जोखिम उठाने वाले युवाओं की आपसदारी में ‘कुक्कुट हरण’ को एडवेंचर किस्म का दर्जा हासिल रहता था…पढ़े कहानी…….

 वे काफी देर बाद जागे। जागने पर करने पर उन्होंने अपने कपड़े बदले हुए पाए। इस परिधान-परिवर्तन को ‘चोला बदल’ जानकर उन्हें मोक्ष क्रिया संपन्न होने का साक्ष्य मिल चुका था। कमरे की काँच की खिडकियों को उस लोक का पारदर्शी संसार मान रहे थे। सभी कुछ उनके अनुमान मुताबिक विद एविडेंस घटित हो रहा था। जब सूक्ष्म शरीर चिंतन करते-करते थक गया तो वे शयन-मुद्रा में चले गये। दस घंटे की घनघोर निद्रा के पश्चात् उनका फिर से पुनर्जन्म संभव हो सका।
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एक अवसर पर हम दो मित्र महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर उस स्थान पर गए। पूर्व-संकल्प लेकर गए थे- पूजा पाठ करेंगे। थोड़ा सा मेला देखेंगे। कोई ऐसी- वैसी चीज नहीं खाएंगे। शिवार्चन किया। फिर वापसी से पूर्व मेला देखने लगे। तभी सहसा हमारे सम्मुख हमारे भतीजे प्रकट भए। भतीजे महाराज जाने-माने भँगेड़ी थी। वे भाँग का सेवन श्रद्धा से एवं प्रचुर मात्रा में ग्रहण करने के लिए विख्यात थे।

वे परम शैव थे। भगवान शिव के विशेषणों को उच्चरित करते हुए चिलम से डेढ़ बित्ते की लपट उठाने के लिए वे भक्तों में परम आदरणीय थे। उनके दर्शन होते ही हमने अतिरिक्त सतर्कता बरतनी शुरू कर दी। नैनों की भाषा में मित्र ने हमें किसी भी प्रकार के पेय पदार्थ का बहिष्कार करने के संकल्प का स्मरण कराया, जिसे हमने समझा भी।

तत्पश्चात् भतीजे ने हमसे ‘एयरगन से फुग्गे फोड़ने’ की माँग की, जिसमें कोई बाधा न देख हमने सहर्ष स्वीकृति दे दी। तीनों जने फुग्गे के स्टॉल पर गये। उसने अपना जौहर दिखाया। उसके आमंत्रण पर मेले का एक और चक्कर लगाने पर मित्र को भूख सताने लगी,  जिसे उसने जोरों से प्रकट  किया।

भतीजे महाशय को मौका मिला तौ वह दौड़कर छह-सात दोने पकौडियाँ ले आया। दोने हस्तगत कराते हुए उसने स्वच्छ हाथों व स्वस्थ मंशा से स्वीकार किया कि इनमें से आधी तो सादी हैं, बाकी गैर-सादी हैं।

हम दोनों नादां होकर भी कवि के भावों का अर्थ ग्रहण कर रहे थे। यह प्रोत्साहन पाकर कि मिश्रित अर्थव्यवस्था के अधीन देश ने कितनी प्रगति कर ली है और चौबीस कैरेट सोने से तो आभूषण भी नहीं बनते, हमने प्रभु को स्मरण किया और थोड़ा सा प्रसाद ग्रहण कर लिया।

तत्पश्चात् कुछ तीखा व नमकीन भोज्य पदार्थ लिया। सूर्य देव की कृपा से प्यास ने हमें पीड़ित करना शुरु कर दिया। पथ-प्रदर्शक भतीजा था। वह हमें एक शीतल पेय के खोमचे पर ले गया। पेय का गिलास खाली करने पर भी प्यास न बुझी। हरित द्रव्य के पेय में यह खूबी होती है कि वह अपनी छाप छोड़ने में कुछ समय जरूर लेता है। उपभोक्ता को यह गुमान रहता है कि इतने से कुछ नहीं होगा। लगभग द्यूत की स्थिति। बस ‘एक आखिरी बार और’ की अनुभूति। ‘ओखली से क्या डरना’ शैली मे कंठ को आकंठ तृप्त किया।

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जनाकांक्षाओं के अनुरूप आगे बढ़कर आइसक्रीम के ठेले पर गए। सब का मान रखना पड़ता है। सो आइसक्रीम खायी। तरंग का प्रभाव तब दृष्टिगोचर हुआ, जब भुगतान के लिए कमीज की बाँयी पॉकेट का बटन खोलने में संघर्ष करना पड़ा। पॉकेट को दुर्भेद्य जानकर ठेलेवाले को ही कहना पड़ा- पॉकेट खोलकर राशि निकालो और आइसक्रीम का मूल्य  काटकर अवशेष राशि पॉकेट में डाल दो।

 ठेलेवाला भला आदमी निकला। उसने आज्ञापालन में देरी न की।

इसके बाद मित्र ने सपेरों की टोली में सर्पनृत्य देखने की इच्छा जताई। वहाँ पहुँचे तो बीन पर नाचते सर्प का लास्य देखने लगे। या तो तरंग का प्रभाव था अथवा साँप वास्तविक रुप से विलंबित लय में नाच रहा था, हमने सपेरे से यह कहकर बीन छीन ली कि तुम कैसे ‘स्नेक चार्मर’ हो जी। इतना धीमा नचाओगे तो दर्शक तो रुष्ट होगा ही, साँप का भी मजा किरकिरा कर दोगे। अन्य दर्शकों ने किसी तरह हमें मनाकर बीन सँपेरे को वापस की। हमारे भतीजे तो आखिर तक इसी बात पर अड़े रहे कि चाचाजी ही बीन बजाएंगे।

 स्थिति को नियंत्रण से बाहर जानकर मित्र ने घर वापसी का सुझाव दिया, जो सर्वमान्य हुआ। ऑटो से वापसी इस तर्क पर अस्वीकार हुई कि तिपहिए का गुरुत्व केंद्र अविश्वसनीय होता है, अतः इसकी सवारी निरापद नहीं है। अंत में पदयात्रा आरंभ हुई। सड़क के किनारे-किनारे आपस में बतियाते हुए चले आ रहे थे। हास्यातिरेक से चेहरा बुरी तरह भिंच गया।

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लगभग तीन किमी की पदयात्रा के पश्चात् एक सब्जी विक्रेता के यहाँ बैठ गए। उसने हालत खराब देख कई नींबू काटकर दिए। नींबू का रस ग्रहण करते हुए हम उसे प्राथमिक क्षेत्र में सफलता के व्यापारिक रहस्य सिखाने लगे। आगे की यात्रा आरंभ की। नींबू ने हमें चलन से बाहर होने से बचाया।

अँधेरा घिर आने पर घर पहुँचे। गृह प्रवेश करते ही माँ ने तीखा सवाल दागा- क्या तुम भंग पीकर आये हो?
अपने दोनों होंठों पर तर्जनी रखकर चुप रहने का संकेत देकर कहा-‘…….किसी को मत बताना। शशश…’

किसी तरह पलंग तक पहुँचे। आगे के घटनाक्रम का स्मृतिलोप हो गया ।

धुँधली स्मृति से स्मरण है कि हमारे पलंग ने भौतिक जगत की समस्त गतियाँ संपन्न की। पहले उत्तोलन तत्पश्चात् दोलन। यह क्रम अनवरत चलता रहा। फिर गति परिवर्तित होकर परिक्रमण व परिभ्रमण मे आ गयी। अंत में घूर्णन गति के आगे का हाल स्मृति से लोप हो गया। चौबीस घंटे बाद हम इस सांसारिक जगत में वापस लौटे। लौटते ही इस प्रयोग को तिलांजलि देकर तौबा कर ली।

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