कुमाऊं में आठू-सातू (सातों-आठूं) त्यौहार एक पारंपरिक और सांस्कृतिक महत्व का पर्व है, जो मुख्य रूप से कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों में भाद्रपद (भादो) मास में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्यौहार लोक कथाओं और परंपराओं से जुड़ा हुआ है और विशेष रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह पर्व संतान प्राप्ति, परिवार की सुख-समृद्धि और वंश वृद्धि की कामना से जुड़ा है।
त्यौहार का महत्व और परंपरा
समय: यह त्यौहार भाद्रपद मास की सप्तमी (सातूं) और अष्टमी (आठूं) को मनाया जाता है।
व्रत और अनुष्ठान:
पंचमी: इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और पांच या सात प्रकार के अनाज (जैसे मटर, चना, उड़द, गेहूं, मक्का, तिल आदि) को साफ करके धोती हैं। इन्हें तांबे या पीतल के बर्तन में भिगोकर घर के मंदिर या पवित्र स्थान पर रखा जाता है।
सप्तमी: महिलाएं व्रत रखती हैं और हरे-भरे खेतों में जाकर मक्का, तिल आदि की बालियां तोड़कर लाती हैं। ये अनाज और बालियां पूजा में उपयोग होती हैं।
अष्टमी: इस दिन मुख्य पूजा होती है, जिसमें माता पार्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा संतान प्राप्ति और परिवार की सुख-शांति के लिए की जाती है।
सामूहिक उत्सव: यह त्यौहार गाँव की महिलाएं और समुदाय मिलकर सामूहिक रूप से मनाते हैं। गीत, नृत्य और लोक कथाओं का वाचन इस अवसर पर किया जाता है।
लोक कथा
इस त्यौहार से जुड़ी एक प्रचलित लोक कथा बीण भाट नामक ब्राह्मण की है:
बीण भाट के सात पुत्र और सात बहुएं थीं, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण परिवार दुखी था। एक बार भाद्रपद सप्तमी को बीण भाट अपने जजमानों के यहाँ जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक नदी में दाल के छिलके तैरते देखे और नदी के किनारे एक महिला को कुछ धोते हुए पाया। पूछने पर महिला (जो वास्तव में माता पार्वती थीं) ने बताया कि वह अष्टमी की पूजा के लिए बिरुड़ (अनाज) धो रही हैं।
बीण भाट ने इस पूजा की विधि सीखी और अपनी बहुओं को इसका पालन करने को कहा। इसके बाद उनकी बहुओं ने यह व्रत और पूजा शुरू की, जिसके फलस्वरूप उन्हें संतान की प्राप्ति हुई। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
सांस्कृतिक महत्व
यह त्यौहार कुमाऊं की समृद्ध लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
यह सामुदायिक एकता को बढ़ावा देता है, क्योंकि गाँव की महिलाएं एक साथ मिलकर इसे मनाती हैं।
इस अवसर पर कुमाऊंनी लोक गीत और नृत्य भी प्रस्तुत किए जाते हैं, जो स्थानीय संस्कृति को जीवंत बनाते हैं।
आधुनिक संदर्भ
आज भी यह त्यौहार कुमाऊं के गाँवों में उत्साह के साथ मनाया जाता है, हालांकि शहरी क्षेत्रों में इसकी लोकप्रियता कुछ कम हो सकती है। यह पर्व कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

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