- लेखक और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ललित मोहन रयाल की कलम से…
“जहाँ गीत और पुराण एक ही बात दोहराते हैं”
कुछ गीत केवल सुने नहीं जाते, वे स्नायुतंत्र में रच-बस जाते हैं। कुछ श्लोक केवल बोले नहीं जाते, वे संस्कार बनकर पीढ़ियों में उतरते हैं।
मेरे जीवन में एक गीत और एक श्लोक का मिलन कुछ ऐसा ही रहा—जैसे खेत की मेड़ पर खड़ा कोई किसान अचानक देखे कि आसमान का रंग और मिट्टी का रंग एक हो गया है।
हमारी परवरिश उस भारत में हुई थी, जो नक्शे में कम और हल की धार, बैलों की चाल और फसलों की बालियों में ज़्यादा बसता था।
सुबह की शुरुआत मुर्गे की आवाज़ से होती, और दिन का गणित धूप की चाल से तय होता। खेतों में काम करना मजबूरी नहीं, जीवन की स्वाभाविक लय था।
किशोर उम्र में जब कंधे पर हल, हाथ में कुदाल या घास की गट्ठर होती, तभी कहीं दूर से रेडियो की आवाज़ हवा पर तैरती चली आती—
थोड़ी खड़खड़ाहट, थोड़ी गूँज, और फिर महेंद्र कपूर की वह गूंजती हुई आवाज़—
“इस धरती पर मैंने जन्म लिया, ये सोच के मैं इतराता हूँ…”
बस…
हल की पकड़ ढीली पड़ जाती।
पसीना अचानक तपस्या लगने लगता।
और मन के भीतर कहीं अज्ञात-सा गर्व अंकुरित हो उठता — जैसे मैं खेत नहीं जोत रहा, मैं इतिहास जोत रहा हूँ।
उस समय समझ नहीं थी कि ये भावना कहाँ से आती है। बस इतना लगता था कि इस धरती से मेरा रिश्ता केवल पेट भरने का नहीं, पहचान का है।
घर लौटते तो दूसरा दृश्य मिलता—
पिताजी, जो विद्यालय में हेडमास्टर थे, घर में परंपरा के प्रहरी थे। सुबह-शाम संध्या, हवन, और फिर उनका गम्भीर, स्थिर स्वर—
“गायन्ति देवा: किल गीतकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमि भागे…”
तब संस्कृत के शब्दों का पूरा अर्थ नहीं समझता था, पर ध्वनि में जो श्रद्धा थी, वह सीधे भीतर उतरती।
ऐसा लगता था मानो देवता भी इस भूमि पर जन्म लेने वालों का गुणगान करते हैं।
एक ओर खेतों में बजता फ़िल्मी गीत, दूसरी ओर घर में गूंजता पुराण का श्लोक— धीरे-धीरे समझ आया—वे अलग नहीं थे।
इंदीवर का लिखा गीत कहता है —
इस धरती पर जन्म लेना गौरव है।
विष्णु पुराण का श्लोक कहता है —
देवता भी इस भूमि पर जन्म लेने वालों को धन्य कहते हैं।
एक ने इसे संगीत में ढाला, दूसरे ने इसे श्रुति में। एक रेडियो से आया, दूसरा परंपरा से। पर भाव? एकदम वही।
तब समझ में आया कि देशभक्ति केवल आयोजन या भाषण में नहीं रहती। वह रहती है—
खेत में झुकी कमर में
पिता के उच्चारित मंत्रों में
रेडियो पर बजते गीतों में
और उस अनजाने गर्व में, जो बिना सिखाए मन में उग आता है
हमारी पीढ़ी ने राष्ट्रवाद किताबों से नहीं, मिट्टी और मंत्रों—दोनों से सीखा।
आज जब बौद्धिक वर्ग में राष्ट्रवाद पर बहस होती है, तो मुझे वे दो आवाज़ें याद आती हैं—
एक, खेतों के ऊपर तैरता हुआ गीत। दूसरी, हवन की गंध में घुला श्लोक। तब समझ आता है—
भारत केवल एक भू-भाग नहीं,
यह एक अनुभूति है, जो कभी गायक गाते हैं, कभी पुराणों के ऋषि।
और हम जैसे ग्रामीण बच्चे?
हम बस दोनों को सुनते हुए बड़े हो जाते हैं—बिना जाने कि हम गीत और शास्त्र के संगम पर खड़े हैं।
लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ IAS अधिकारी ललित मोहन रयाल है जिनकी अब तक पांच पुस्तक प्रकाशित चुकी हैं।

अपने मोबाइल पर ताज़ा अपडेट पाने के लिए -
👉 व्हाट्सएप ग्रुप को ज्वाइन करें
👉 यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें
हमारे इस नंबर 7017926515 को अपने व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ें



धामी सरकार के अभियान में एक और कार्रवाई, यहां ध्वस्त की गई मजार
कैंसर की महंगी दवाओं पर सरकार का बड़ा फैसला, 93% तक घटी कीमतें, जानिए कब से मिलेगा फायदा
नैनीताल : शिवराम अब कमर में नहीं खोश पाएगा बंदूक, DM ने निरस्त कर दिया लाइसेंस
नैनीताल में अपराधियों पर प्रशासन का शिकंजा, पांच आरोपी छह माह के लिए जिला बदर
बागेश्वर: नुमाइशखेत में तीन नवंबर से लगेगा सरस मेला, 35 स्टॉलों पर प्रदर्शित होंगे ग्रामीण उत्पाद
हल्द्वानी : यातायात व्यवस्था सुधारने और आवासीय परिसरों में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मामले में पुनर्विचार याचिका लगाने की मांग
Karwa Chauth 2026: उत्तराखंड में आज कितने बजे निकलेगा चांद? जानें 8 शहरों का समय
दिल्ली से हरिद्वार सिर्फ ढाई घंटे में! दिसंबर से नए कॉरिडोर पर दौड़ सकते हैं वाहन
उत्तराखंड शिक्षा विभाग में बड़ा फेरबदल, 18 अधिकारियों को मिली पदोन्नति; नई तैनाती के आदेश जारी
उत्तराखंड : यहां हाईवे पर दर्दनाक हादसा, बाइक सवार दंपती की मौत 
