
‘मैं’ मेरी माँ जैसी होने.लगी हूँ..
अपने आपको भुलाकर परिवार के लिए जीने लगी हूँ सबके बाद जागती थीं अब सबके

अपने आपको भुलाकर परिवार के लिए जीने लगी हूँ सबके बाद जागती थीं अब सबके
कैसा आया ये संकट, कैसी हैं ये दशा किसको कहूं मैं अपने मन की व्यथा

इस भागदौड़ भरी जिंदगी से हट कर कुछ काम करो, 21 दिन मिले हैं कम


घरेलू हो गया मैं आज़ पर पालतू नहीं ….. ख़ाली बैठा हूँ मैं आज़ पर

क्यों शहर में आज सन्नाटा है, घर मे दुबके है लोग किस डर से, परिंदे



जनमानस के जीवन पर एक खतरा मंडराया है कहते हैं दूर चीन से कोरोना आया

ढूंढते हुए घर पर अपनी कुछ अज़ीज़ चीजों को,अक्सर नज़र तो तुम्हारी भी उन सामानों