“रिटायरमेंट के बाद की नई पारी (लघुकथा)”
कृष्ण और रुक्मणी के तालमेल में कुछ कमी थी। कृष्ण सरकारी नौकरी में था, यही देखते हुए रुक्मणी के पिता ने रुक्मणी का विवाह कृष्ण के साथ किया था। उनके गुणों में बहुत ही असमानता थी। दोनों के स्वभाव भी उत्तर और दक्षिण थे। जहाँ कृष्ण का जिंदगी के प्रति उदासीन रवैय्या था, वहीं रुक्मणी के जीवन में हर्ष-उल्लास, नवीनता और प्रसन्नता के रंग समाहित थे। चूंकि कृष्ण को काम का अत्यधिक दबाव था तो वह अपने कार्य में ही अत्यधिक व्यस्त रहता था। दोनों को साथ बिताने के लिए समय ही कम मिलता था तो नोंक-झोंक, टकरार का प्रश्न भी कम हो जाता है, पर रुक्मणी के मन में जीवनसाथी के रवैये के प्रति हल्की सी टीस जरूर थी। परंतु कृष्ण की एक अच्छी आदत थी कि वह रुक्मणी के किसी भी क्रियाकलाप में कोई अनावश्यक दखलंदाजी नहीं करता था। अतः रुक्मणी ने भी अपनी जिंदगी को अपने अंदाज से जीना सीख लिया था।
कृष्ण के जीवन में अध्यात्म की ऊंचाइयों का बहुत महत्व था और साथ ही उसे खेल अत्यधिक प्रिय था। कृष्ण और रुक्मणी अपने-अपने स्तर पर कर्तव्यों का निर्वहन, बच्चों की परवरिश अच्छे तरीके से कर रहे थे। लोगों के सामने उनका सामंजस्य भी ठीक-ठीक था। दोनों एक-दूसरे के स्वभाव के अनुरूप परिस्थितियों को अनुकूल बनाना सीख चुके थे। दोनों ने कभी एक-दूसरे को कोई दोष नहीं दिया और जीवनयात्रा के कई वर्ष ऐसे भी पूरे कर दिए। इतना समय तो बीत गया पर अब बारी थी कृष्ण के रिटायरमेंट की। रुक्मणी कृष्ण के साथ आने वाले समय को लेकर काफी चिंतित थी, क्योंकि अब कृष्ण पूरा दिन घर में ही रहेगा। हो सकता है रुक्मणी का स्वभाव उसे अच्छा न लगें। काम नहीं होगा तो चिड़चिड़ापन हावी होगा और बिना मतलब ही घर की सुख-शांति भंग होगी। रुक्मणी रोज ईश्वर से प्रार्थना करती कि प्रभु अब बिना मतलब घर में क्लेश न हों, पर कृष्ण की सोच तो एक कदम आगे ही थी। वह रिटायरमेंट के बाद एक नई पारी खेलने को तैयार था। वह उन दोनों के मनभेद को अच्छी तरह समझता था। कुछ अच्छा पढ़ना तो हमेशा से ही उसका स्वभाव था, तो बस सोच लिया की एक लाइब्रेरी जॉइन करेगा और ज्ञान व अध्यात्म की ऊंचाइयों को छूने का प्रयास करेगा, पर बाद में मेरे सेहत कहीं रुक्मणी के लिए कष्टकारी न बन जाए इसलिए साथ-साथ किसी व्यायाम या खेल में स्वयं को व्यस्त रखने का निर्णय लिया। रिटायरमेंट के बाद एक और अच्छा निर्णय लिया कि किसी भी स्कूल में जरूरतमंदों को शिक्षा उपयोगी जानकारी दूंगा। उसने अपनी भावी सोच से रुक्मणी को भी अवगत कराया। रुक्मणी को जाने-अनजाने में ही सही पर कृष्ण की सोच पर गर्व हो रहा था।
इस लघुकथा से यह शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति अपनी उन्नत सोच से भविष्य में होने वाली तकलीफ़ों को कुछ कम करके नवीन रूप दे सकता है। जैसे कृष्ण ने स्वयं ने दूसरों और रुक्मणी के हित में निर्णय लिया और जीवन को परेशानियों का मैदान होने से बचाया। कई बार जीवन में समस्याओं के समाधान के लिए सिर्फ हमारी वृहद सोच आवश्यक है, जिससे की हम परिस्थिति के अनुरूप तालमेल बैठा सकें।डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)
लेखिका परिचय
लेखिका डॉ. रीना रवि मालपानी
कवयित्री, लेखिका एवं पूर्व व्याख्याता
डॉ. रीना ने मूलतः कार्बनिक रसायन शास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है इसके साथ ही वे साहित्य के क्षेत्र से भी जुड़ी हुई है।
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