Badrinath Dham

उत्तराखंड: भू बैकुंठ बदरीनाथ धाम के कपाट बंद

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चमोली (उत्तराखंड): विश्व प्रसिद्ध चारधामों में से एक बदरीनाथ धाम के कपाट आज दोपहर 2 बजकर 56 मिनट पर शीतकाल के लिए विधि-विधान के साथ बंद कर दिए गए। इस पावन क्षण के साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु धाम पहुंचे। बंदी के अवसर पर बदरीनाथ मंदिर को करीब 12 क्विंटल गेंदे के फूलों से सजाया गया, जिसकी भव्य छटा देखते ही बन रही थी। सेना के बैंड की धुन और “जय बदरी विशाल” के गगनभेदी जयकारों से पूरा धाम गूंज उठा।

कपाट बंद होने के बाद भगवान बदरी विशाल की उत्सव मूर्ति, भगवान उद्धव और भगवान कुबेर की मूर्तियाँ अपने शीतकालीन प्रवास के लिए रवाना हो गईं। परंपरा के अनुसार, भगवान बदरी विशाल की स्वयंभू शालिग्राम मूर्ति को बदरीनाथ से बाहर नहीं ले जाया जाता…लेकिन उत्सव मूर्ति को शीतकालीन पूजा के लिए ज्योतिर्मठ स्थित नृसिंह मंदिर में ले जाया जाता है। वहीं भगवान उद्धव और कुबेर की मूर्तियाँ पांडुकेश्वर के योगध्यान बदरी मंदिर में विराजमान होती हैं।

कपाट बंद होते ही धाम में चहल-पहल कम हो गई और शीतकाल की शांति बदरीनाथ में उतर आई। समुद्र तल से 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बदरीनाथ धाम को धरती का बैकुंठ कहा जाता है। मंदिर परिसर में भगवान विष्णु की शालिग्राम से निर्मित एक मीटर ऊंची ध्यानस्थ प्रतिमा प्रमुख आकर्षण है…जिसके साथ कुबेर, लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियाँ भी विराजमान हैं।

बदरीनाथ धाम “पंच बद्री” परंपरा का केंद्र है…जिसमें योगध्यान बद्री, भविष्य बद्री, वृद्ध बद्री और आदिबद्री भी शामिल हैं। ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार इस धाम को आदि गुरु शंकराचार्य ने चार धामों में से एक के रूप में स्थापित किया था। यही कारण है कि मंदिर के मुख्य पुजारी परंपरा के अनुसार दक्षिण भारत विशेषकर केरल से नियुक्त किए जाते हैं।

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शीतकाल में बदरीनाथ धाम बंद रहने के दौरान पूजा-अर्चना ज्योतिर्मठ और योगध्यान बदरी में जारी रहेगी। अगले वर्ष अक्षय तृतीया पर कपाट पुनः खोलकर बदरीनाथ यात्रा आरंभ की जाएगी।

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