एक उम्मीद को मैंने लड़ते देखा
रात का दामन चीरते देखा .
थके पसरे सोए जब थे सब .
मैंने सूरज को लड़ते देखा ,उगते देखा .
फैला रहा था नई उम्मीद ,
मैंने जीवन को उगते देखा .
भरी दुपहरी उलझी गुत्थी
जीवन एक सवाल ?
जैसे पहाड़ के पीछे , खड़े हों दर्जनों पहाड़!
बोलो कितने पहाड़ ?
उलझ उलझ कर इन जालों में ,
सूरज भी मानो हार गया .
फिर जा बैठा गोद उम्मीद की .
सूरज अस्तांचल में सो गया .
उम्मीद कि फिर उग आऊंगा .
गहरी रात भरोसे की है .
कांच सी बिखरी, कांच सी टूटी… उम्मीद .
यूं उमीद का टूटना ठीक नहीं .
जीवन बहती धार नदी की ,
यूं पतवार का छूटना ठीक नही
ठीक नही .ठीक नही .

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2 thoughts on “सूरज का सफर”
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Bahut he khoobsurtat or prennadayak
सुक्रिया