उनके सिद्धांतों का सभी लोहा मानते थे, चूँकि उनमें अंतर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने तक की मारक क्षमता विद्यमान थी..

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 शिक्षा और बुद्धिमत्ता का हमेशा सीधा संबंध नहीं होता। कई बार देखने में आता है कि निरक्षर  व्यक्ति अपनी व्यावहारिक बुद्धि के सहारे बड़े-बड़ों के कान काट लेता है। जीवन-अनुभव से वह जटिलतम स्थिति में भी सहज समाधान ढूँढ निकालता है।

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       पोथी पढि-पढि, जग मुआ:


प्रतिभा कभी किसी की मोहताज नहीं होती। यद्यपि मसि-कागद से उनका क्षणिक संपर्क भी न हो सका, तथापि  विवादों को सुलझाने के उन्होंने शुद्ध देसी तरीके ईजाद किये हुये थे।

    उनके सिद्धांतों का सभी लोहा मानते थे। चूँकि उनमें अंतर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने तक की मारक क्षमता विद्यमान थी। वे चाह भर लेते तो क्षेत्रीय विवाद बात-की-बात में सुलझा लेते थे, उसी सीमा तक जहाँ तक वांछित हो। ताकि अवांछित होने की स्थिति में विवाद को पुनर्जीवित करने का सुभीता बना रहे। विवादों को बूझने व उचित दिशा देने में उनकी क्षमता अचूक थी।

लेन-देन के मामले में लिखित कार्यवाही भूलकर भी नहीं करनी चाहिए, सिद्धांत को मुख में तृण रखकर निभाते थे।
होश संभालने पर उन्होनें भूलवश भी पैरों में ‘जूता’ नहीं पहना। चित्रकार एम.एफ. हुसैन का मामला जरा अलग था। उन्होंने तो अपने किसी प्रियजन के अंत्येष्टि संस्कार के विह्वल क्षणों में ऐसा संकल्प ले लिया था।

इधर इन्होंने प्राचीन संस्कृति के मोह में आजीवन नंगे पैर रहने का व्रत धारण किया हुआ था। जानकारों के मुताबिक संस्कृत का ‘पादत्राण’ पादुका का समानार्थी है। शुरुआती वषों में इन्होंने इसका शाब्दिक अर्थ ‘पैरों को त्राण देने वाले’ के अर्थ में ग्रहण किया। त्रुटिपूर्ण अर्थ का शुद्ध अर्थ जानकर भी उन्होंने जुबान पर कायम रहकर आजीवन इस व्रत को निभाया।

वस्त्राभरण ऐसे पहनते थे मानों उनमें कोई दिलचस्पी न हो। ‘ऑड इज मॉड’ शैली के, फैशन के चलन से नितांत भिन्न अथवा वह फैशन जो सुदूर भविष्य में आने वाला हो। जमाने के चलन से भिन्न व न्यूनतम जरुरी वेशभूषा उन्हें समकालीनों से अलग करती थी। योरोप निवासी उनके बड़े भाई निरंतर वस्त्र भेजते रहते थे।

निजी संस्कारवश वे विदेशी ‘गाउन’ को भी स्वदेशी ढंग से धारणकर उन्मुक्त भाव से नंगे पाँव हल जोतते दिखायी पड़ते थे। उनका यह स्वरुप कहीं-न-कहीं पश्चिम के ‘काऊ ब्वॉय’ किसानों की छवि याद दिलाने में सहायक होता था। उपहास की उन्होंने कभी रत्ती भर परवाह नहीं की, क्योंकि वे अपना बड़प्पन जानते थे।

चेहरे पर चिंतको-सी दाढी उनके व्यक्तित्व का परिष्कार करती थी। रस्मी तौर पर जैसे बिरादरी में गमी के मौके पर सामूहिक क्षौर कर्म इत्यादि अवसरों पर उन्हें दाढी मुंड़वाने में कोई क्लेष न होता था। अन्य अवसरों पर उस्तरे के कुंद पडने के जोखिम को वे भली-भाँति जानते थे।

निर्वाचित प्रतिनिधि की हैसियत से प्रत्येक विवाद व विवाद के समाधान के मौकों पर उनकी उपस्थिति अनिवार्य रूप से पाई जाती थी। आड़े-तिरछे खेतों के सीमा विवाद, पहुँच मार्ग के विवाद, दरियाबुर्द भूमि की नपती, बंद मार्ग को खुलवाना, खुले मार्ग को बंद करवाना, विवाह व विवाह-विच्छेद से पूर्व का परामर्श, अमानत में खयानत, वित्तीय विवाद, फसल क्षति का हर्जाना आदि मुद्दे उनकी विशेषज्ञता के दायरे में आते थे।

समाधान गोष्ठियों व पंचायतों में वे गंभीर मुद्रा अख्तियार किये रहते थे। उभय पक्षों की चीख-पुकार में समस्त ऊर्जा क्षीण होने के पश्चात्, अन्य पंचों के समस्त प्रयास विफल हो जाने के बाद ही वे थाह लेकर विवाद के संबंध में अपनी शाकाहारी वाणी प्रस्तुत करते थे।

       सद्य प्राप्त अनुभव के गवाक्ष से झाँककर वे फैसले के रुप में सार्वभौमिक नसीहतें देते थे। उनकी नसीहतें आशीर्वाद स्वरुप होती थी। समयानुकूल व्यावहारिक नीति अपनाकर वे काम भर के रस्मी फैसले करते थे और फैसले के रुप में हमेशा ‘स्टे’ देते। निर्णय प्रक्रिया में उनके तर्क बौद्धिक नहीं,  दार्शनिक होते थे।

दरअसल वे उपाय तथा मार्ग सुझाते थे, विधान नहीं, सिद्धांत तो कतई नहीं। लिखा-पढ़ी को न तो निजी जीवन में कभी महत्त्व दिया, न सार्वजनिक जीवन में। वे ‘क्यों’ की चिंता में कभी नहीं पड़े। ‘कैसे’  का अनवरत चिंतन करते रहते थे। विज्ञान भी ‘क्यों’ की नहीं’ कैसे’ की अध्ययन प्रणाली है। इन अर्थों में वे सच्चे वैज्ञानिक थे।

उनका चुनाव जीतने का पैटर्न शुद्ध, असली, प्राचीन वैदिक पद्धति पर आधारित था। उनकी ठेठ देशज, उद्बोधन शैली से जनता उनको अपनों में से एक पाती थी। सौगंध दिलाने की उनकी शैली प्रायः अभिचार क्रियाओं के समीप जा पहुँचती। ‘कहो तो स्टाम्प पर लिखकर दे दूँ’ जुमला बोलने वालों के लिए वे भिन्न प्रणाली अपनाते थे।

वैदिक आर्यों की कबीलाई-प्रणाली को उन्होनें, लगभग आत्मसात किया हुआ था। भाई-बंध, वंशवृक्ष, भौगोलिकता, व्यवसायगत श्रेणी, कर्षण कर्म, नदी-प्रणाली व अन्यान्य जटिल अंतर्संबंध उनके गुप्त व अलिखित ‘मेनिफेस्टो’ में शीर्ष स्थान पाते थे। चूँकि भाड़े पर हल-बैल से जुताई पर एकाधिकार रखने वाले ये एकमात्र राजनेता थे। फलस्वरुप किसानों का एकतरफा रुझान कुछ स्नेहवश व कुछ अन्य कारणों से उनके पक्ष में रहना स्वाभाविक होता था। कई पंचवर्षीय तक उनका ‘नोमिनेशन भरना’सदन में प्रवेश की गारंटी बना रहा।

एक अवसर पर उनकी परंपरागत सीट महिला रिजर्व होने से विरोधियों में हर्ष की लहर दौड़ गयी। सदन में प्रवेश के लिए वे आजीवन प्रतिज्ञाबद्ध थे। समाधान स्वरुप उन्होंने अन्य प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र से पर्चा दाखिल कर दिया। उस सीट के प्रत्याशी सुशिक्षित, सुसंस्कृत व स्वयं को मानिंद मानते आ रहे थे। इनके बाहरी प्रत्याशी होने से उन्हें मुकाबला इकतरफा लगने लगा।

कथानायक ने अपने चुनावी पैटर्न के हिसाब से पूर्व की भाँति चुनाव चिह्न के रुप में कोई फल लिया। चुनाव चिह्न के मामले में वे दुर्धर्ष फल-प्रेमी थे। उसी फल को वरीयता देते थे, जिसका उद्गम स्थल उनका बगीचा हो, मसलन केला। सुशिक्षित प्रत्याशी ‘डेली नीड्स’ प्रतिष्ठान के संचालक थे। स्वाभाविक रुप से उन्होंने ‘डबलरोटी’ चुनाव- चिह्न को वरीयता दी।


           सुशिक्षित प्रत्याशी ने अपनी स्थिति मजबूत जानकर बाहरी प्रत्याशी के शिक्षा-संस्कार, पूर्ववृत्त व स्वयं की सुरुचिसंपन्नता को ‘मेनिफेस्टो’ में प्रमुख स्थान दिया। मेनिफेस्टो में उल्लिखित एजेंडे को मजबूती देने के लिए पोस्टर-बैनर में चुनावी वायदों को दोहराया गया। संक्षेप में मेनिफेस्टो केंद्रित आक्रामक प्रचार शैली अपनायी गयी व प्रचार साधन के रुप में प्रचुर मात्रा में मुख का उदार उपयोग किया गया।

उधर कथानायक मसि-कागद के भरोसे चुनावी समर में न कूदे थे, न ही अतीत में उन्होंने इस प्रयोग की आजमाइश की थी। वे बैनर-पोस्टर के इस तरह के प्रयोगों को विद्या के साघनों का अनादर मानते थे। साथ ही शून्य लागत पर चुनाव लड़ने व जीतने को कटिबद्ध थे। मतदाताओं के मनोभाव भाँपकर ही वार्ता की शैली अपनाते थे।


स्थानीय प्रत्याशी की प्रचार शैली नें इनको निरक्षर मतदाताओं की संवेदना का पात्र बना दिया। साथ ही उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर भी मुफ्त में मिल गया। वे चुनावी सभाओं के स्थान पर जनसंपर्क करने में विश्वास रखते थे। वैदिक पद्धति से प्रचार की पृष्ठभूमि उनको सुगमता से उपलब्ध हो गयी। खेती-बाड़ी उनके जनसंपर्क का प्रमुख विषय था। इन विषयों की बात चलने पर वे सदैव वोटर को अतिरिक्त सूचना देने की स्थिति में रहते थे। हालांकि कुछेक अवसरों पर उन्हें ‘जोड-तोड’ व लॉबिंग की  प्रतिभा भी दिखानी पड़ी। यद्यपि उनके समस्त कारनामों का स्वरुप सांस्कृतिक व दार्शनिक स्तर पर ही रहता था।


सांस्कृतिक स्तर पर लड़े गये इस चुनाव के परिणाम ने चुनाव विश्लेषकों को चौंका दिया। सुशिक्षित व स्थानीय प्रत्याशी की जमानत जब्त होने पर उन्होंने अप्रत्याशित हार के अंतर्निहित कारणों की समीक्षा की। निष्कर्ष में उन्होंने पाया कि वे ‘डबलरोटी’ के बगीचे के स्वामी न थे। प्रतिद्वंदी कदली वन से घर-घर जाकर चुनाव-चिह्न का वितरण करने में सफल रहे।


स्थानीय प्रत्याशी सुशिक्षित थे। अतः वे निरक्षर मतदाताओं की संवेदनायें भुनाने में सफल न हो सके। उनके घोर समर्थक, शिक्षित मतदाता भी बैलेट पेपर में डबलरोटी व ईंट के चुनाव-चिह्न के अंतर को न भेद सके।(बैलेट पेपर ब्लैक एंड व्हाइट रहता था, जिसमें डबलरोटी व ईंट एक जैसी दिखती थी।) अंतिम व सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकला कि ग्रामीणों को अपने खेत बंजर रखने की अभिलाषा न थी। कथानायक वोटरों से कहता था- वोट उसको दोगे, तो खेतों में हल भी उसी से चलवाना।

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