अपने दर्द -जख्म और आसुओं को
समेट लेती है अपने अन्तरस में उसी तरह
ज्यूं बाँज उत्तीस फ्ल्याँट सहेज कर रखते है
अपनी जड़ों में बरसात का पानी
लेकिन पहाड़ की औरतें
साझा करती है सुख के पल सामूहिकता में
भिटौली के बताशों की तरह
या कदमताल में गाते हुए कोई नया झोड़ा
इसी जज्बे से जीवित है जलस्रोत पहाड़ के
ऐसे ही खिलते है बसंत के फूल…..भाग 1………
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