पिछले भाग से …. पहाड़ व पहाड़ के त्यौहार ,,,करवाचौंथ ,, उस दिन मैं और मेरी पत्नी जो कि महाराष्ट्रियन है शांत चित मेरे लोहाघाट स्थित घर के बरामदे में से अपने नये नवेले घर को निहार रहे थे , अचानक से हम दोनों का ध्यान गूँज रही उन शंखों की आवाज़ की तरफ़ गया , देखा तो तमाम घरों कि छतों में दिये की रौशनी करती व शंखनाद करती हुई पूरे कॉलोनी की महिलायें मानो हमारी पहाड़ी परम्परा की ध्वज पताका पूरे भारत वर्ष में फहराने को आमादा हों , जहाँ तक नज़र दौड़ायी व कान लगाये बस शंखो की आवाज़ व दीयों की रैशनी में नहाये हुये छतें ही नज़र आयीं , मैंने भी सोचा कोई नया त्यौहार शुरू हुआ होगा पहाड़ों में , तभी मेरी पत्नी ने मुझ से पुछा , कि करवाचौंथ क्या यहाँ भी मनाते है , तब मुझे कोई जवाब नहीं सूझा , आप उसे मेरा आश्चर्य चकित हो जाना , या दूसरा कुछ वग़ैरह – वग़ैरह हो जाना अपने हिसाब से समझ सकते हैं , या कुछ और हो जाने का आँकलन भी कर सकते हैं .
‘बात पहाड़ की’ लोकगायक बीके सामंत की कलम से (भाग 1)
अब हम आते पहाड़ की उन चट्टान से हौंसलों वाली पहाड़ की शेरनियों पर जो आज भी गाँवों को गुलज़ार रखे हुई हैं . ये मातृशक्तियाँ मेरे लिये हमारे पहाड़ के तीज त्योहारों की सबसे बड़ी ध्वजवाहक / ध्वजावाहिकायें हैं , इनके बारे में मेरा लिखना मैं समझता हुँ कि आप सभी का इनके बारे में सोचना व सोचकर इन्हें समझने वाली सीढ़ीं की सब से आख़िरी क्यारी भी शायद ही हो ,, प्रणाम है मेरा पहाड़ की इन सब ध्वजवाहिनियों को..

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