वरिष्ठ PCS अधिकारी ललित मोहन रयाल की पुस्तक “चाकरी चतुरंग” की समीक्षा IPS अमित श्रीवास्तव की जुबानी

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व्यावहारिक- सामाजिक सन्दर्भों में ‘व्यवस्था’ का दृश्य-अदृश्य जितना व्यापक प्रभाव है साहित्यिक-सामाजिक विमर्श में ये उतना ही सामान्यीकृत पद है. इसे लेकर विवेचन के सन्दर्भ बहुत संकुचित हो जाते हैं क्योंकि सबको अपने-अपने हिस्से की व्यवस्था से दो-चार होना पड़ता है. दूसरा, पारदर्शिता के तमाम प्रयासों के बाद भी इसकी आंतरिक प्रक्रियाएं कम ही दृश्यमान हो पाती हैं. यही कारण है कि इसे पकड़ने का सांगोपांग प्रयास समाज और साहित्य दोनों में ही कम ही देखने को मिलता है.


Lalit Mohan Rayal का ‘चाकरी चतुरंग’ ऐसा ही एक प्रयास है. किसी भी संस्था (‘व्यवस्था’ को यदि संस्थाओं का समूह कहा जा सके तो) को उसके प्रमुख अंगों यथा उसमें कार्यरत कर्मचारी, उपलब्ध संसाधनो, कार्य-योजना और उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया को जाने बिना समझना मुश्किल है और चूंकि ये व्यवस्था एक लोक कल्याणकारी राज्य की है तो आमजनता को भी इसी संस्थागत ख़ाके में ही शामिल किया जाना चाहिए.


‘चाकरी चतुरंग’ के चार अंगों में लेखक ने प्रतीकात्मक रूप से इस व्यवस्था के समस्त संरचनात्मक और व्यावहारिक अवयवों को समाहित करने का अच्छा प्रयास किया है. इस लिहाज से इस उपन्यास का पाट काफी चौड़ा है. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें प्रशासनिक व्यवस्था की निरंतरता की झलक भी मिलती है. एक निश्चित कालखण्ड की कथा कहते हुए भी पुस्तक में ऐतिहासिक और वैश्विक सन्दर्भ आ खड़े होते हैं. इस लिहाज़ से ये एक रुकी हुई रचना नहीं है बल्कि इसमें गति है और भविष्य में झांक लेने की ताब भी.


साहित्य, प्रामाणिकता और कल्पना के बीच की चुनौती भरी उर्वर ज़मीन पर पनपता है. चुनौती इस वजह से क्योंकि अतिशय कल्पना इसे दलदली तो प्रामाणिकता के चक्कर में तथ्यात्मक अतिशयता इसे बंजर बना सकती है. लेखक स्वयँ एक लोक सेवक हैं अतः किताब के बंजर हो उठने की संभावना बहुत थी. लेकिन लेखक की सजग-तटस्थ दृष्टि में भी एक सरसता है, हास-परिहास का पुट है और व्यंजनात्मक क्षमता भी, जिसने इस किताब को दोनों ही अतियों से बचाकर रक्खा है.


किताब जितनी अभिधा में खुलती है उससे ज़्यादा व्यंजना में. भाषा कहीं-कहीं शुद्धता की आग्रही हो उठी है. ‘नई हिंदी’ के पाठकों को चौंकना पड़ सकता है. किसी व्यंग्य रचना का भाषागत सौंदर्य यही है कि कहन की वक्रता और दृश्य की व्यंजना निखर जाए. भाषा के साधक होने की दृष्टि से लेखक की यह उपलब्धि मानी जाएगी. उस कसौटी पर लेखक खरे उतरते हैं. हास्य उपजाने का प्रयास ऊपर है, ओवरबोर्ड, और व्यंग्य अंदर है, अंडरटोन. इस अंडरटोन को समझने के लिए पूरे ‘चाकरी चतुरंग’ के वितान पर नज़र रखनी होगी. मेरा सुझाव है कि जब आप चौथे अंग की दूसरी कथा पर हों आपके ज़ेहन में पहले अंग की सातवीं कहानी भी कौंधनी चाहिए. यही इस उपन्यास को पढ़ने की चाभी भी है. एक बड़े फलक के उपन्यास की तरह.


ये उन मायनों में उपन्यास नहीं है, आलोचना के क्लासिक मानदंड जिनपर रचना को कसते हैं. दरअसल साहित्य का समकाल विधाओं की टूट-फूट और ढांचागत संशोधन-समायोजन के लिए भी जाना जाएगा. यहाँ कहानी लीनियर तरीके से नहीं कही गई है. ये कह सकते हैं कि एक मुख्य कथा के साथ बहुत सी अवान्तर कथाएं आती हैं और इस तरह से आती हैं कि इन अवान्तर कथाओं का समुच्चय ही मुख्य कथा बन जाता है. ये सच है कि अक्सर इस किताब को पढ़ने की चाभी खो जाती है और अवान्तर कथाएं टूटी-बिखरी-बह गई सी प्रतीत होने लगती हैं, मुख्य कथा भी बाधित होने लगती है. ऐसे में एक अंतर्धारा है जो इनसब को एकसाथ करती है. वो अंतर्धारा वही है जो मुख्यधारा का अदृश्य भाग है, जो साथ-साथ है, जिसकी कथा कही गई है. सिस्टम. व्यवस्था. राज-काज. तो व्यवस्था के नानाविध अंग-रंग, चाल-ढंग, भाव-भंग को संतुलित किंतु चुटीले अंदाज़ में परखते ललित मोहन रयाल के इस उपन्यास ‘चाकरी चतुरंग’ का साहित्य जगत में स्वागत किया जाना चाहिए.
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