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अनाथ मुहल्ले के ठुल-दा

‘अनाथ मुहल्ले के ठुल-दा’ समीक्षा लेखक ललित मोहन रायल की कलम से…

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वरिष्ठ कथाकार बटरोही जी का कथा-संग्रह ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल-दा’ अप्रैल 2021 में समय साक्ष्य से प्रकाशित होकर आया है. यह संशोधित संस्करण है जो इसी नाम से 1991 में प्रकाशित हुआ था, हालांकि इसमें कुछ कहानियां हटा दी गई हैं, कुछ नई जोड़ी गई हैं.
संग्रह में पांच कहानियां है, जिनका कथा-प्रदेश नैनीताल है. पांचों कहानियां आकार की दृष्टि से लंबी है, जिनमें विभिन्न प्रकार के चरित्र आते हैं. कहानियों का आधार जीवन-संघर्ष है. भाव, विचार, अनुभूति के जरिए समकालीन मुद्दों पर गहरा विमर्श हैं. व्यक्ति-वैचित्र्य के जरिए कथाकार मानव मन के विभिन्न स्तरों पर उतरकर अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग भावों का उद्घाटन करते हैं।

संग्रह की शीर्षक कथा ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’आजाद हो चुके भारत में नैनीताल कस्बे की कथा है. ओक कॉटेज में रहने वाली रोजी एडवर्ड् हम्बल ओरिजिन (कामगारों के) बच्चों को सात समंदर पार की परी जैसी लगती है. बालसुलभ चेष्टा के वशीभूत रोजी गली-कूचे के इन बच्चों के साथ ‘गुच्ची’ खेलना चाहती है. अंग्रेजियत की ग्रंथि पाले ठुल दा’ रोजी के लिए बच्चों से पैरवी करते हैं।


हाई स्कूल में अंग्रेजी में दो बार फेल होने के बावजूद ठुल दा’ अंग्रेजी विषय को संसार के सारे विषयों का निचोड़ मानते हैं. वे फटाफट अंग्रेजी बोलने वाले पब्लिक स्कूल के बच्चों से बुरी तरह आच्छादित रहते हैं. ओक कॉटेज उन्हें पी बी शैली की कॉटेज जैसी लगती है, जिसका वे बिना किसी अंतराल के नियमित रूप से चक्कर काटते रहते हैं. दूसरी ओर वे मोहल्ले की सुख-साधनहीन बच्चों के अभिभावक बने रहते हैं और मार-मारकर उन्हें उल्टी-सीधी अंग्रेजी बोलने लायक बना देते हैं. उनकी निगरानी की बदौलत उनमें से अधिकांश बच्चे नौकरीपेशे में जगह बनाने में कामयाब हो जाते हैं।

समय के साथ एडवर्ड इंग्लैंड चली जाती है. अब उस कॉटेज में मिसेज मार्गरेट रहती हैं, जो ऑक्सफोर्ड वाले उच्चारण में विक्टोरियन अंग्रेजी बोलती है. ठुल दा’ उस कॉटेज से संसर्गजनित रोग लेकर लौटते हैं और जिंदगी भर जिस गंवारू भाषा से बचते रहे, उसी भाषा में कलपते-कराहते रह जाते हैं. संग्रह की दूसरी कथा ‘मिसेज धारियाल के तीन इक्के कभी नहीं आए’ “बच्चे पालना और अपनी बौद्धिक आकांक्षा के लिए जीना, दो अलग-अलग और परस्पर विरोधी चीजें हैं” थीम पर आधारित है।


मिसेज धारीवाल लेक्चरर बनकर आती हैं, उनके पति सर्जन हैं. वह उस सोच की महिला हैं, जो चाहती हैं कि मां पूरी तरह मुक्त रहे, सैर-सपाटा, बैठक-गोष्ठियों में शिरकत करती रहें, घरेलू जिम्मेदारी सिर्फ पति की हो. यह उस दौर की बात है जब वह कस्बा शहर में बदल रहा था. देखते-देखते वह नेत्री बन जाती हैं. समाज सेवा के क्षेत्र के विकल्प को लेकर दंपत्ति में कहासुनी हो जाती है. मैं अपने ढंग से जी सकती हूं, मासेज से जुड़ी हूं, किसी की दया पर नहीं रहना चाहती, सोच के चलते उनकी गृहस्थी पटरी से उतर जाती है और वह नारी मुक्ति की मसीहा बन जाती है।


वे असहाय स्त्रियों की सहायता करती है, लेकिन उन्हें इस बात का मलाल रहता है कि स्त्रियां न तो पूरे मन से अपने अतीत को स्वीकार कर पाती हैं, न वर्तमान को. पता नहीं कब वह वक्त आएगा, जब मर्द औरत के इस दर्द को समझेंगे और औरत भी अपना बराबरी का हक मांगेंगी. नारी-मुक्ति के संदर्भ में इतनी लाउड होने के बावजूद वह परोपकारी-विदुषी महिला दोहरा जीवन जीती हैं।

तीसरी कहानी ‘आगे के पीछे’ एक साठ साला धनी विधुर की कहानी है, जो पत्नी की मृत्यु से आई रिक्तता के चलते नितांत एकाकी हो जाते हैं. विवाहित पुत्री-दामाद, भाई-भतीजे, पड़ोसी के बीच उनकी चल-अचल संपत्ति को लेकर चल रही रस्साकशी से उनका यह एकाकीपन और ज्यादा गहरा जाता है।


इस रिक्तता को भरने के लिए तेरहवीं के फौरन बाद वे एक प्रौढ़ा से विवाह कर लेते हैं, लेकिन जिस उम्मीद से उन्होंने यह कदम उठाया था, नतीजा उसके विपरीत निकलता है. उनकी कशमकश खत्म होने का नाम नहीं लेती. कहानी वर्तमान और फ्लैशबैक में कोलाज के रूप में एकसाथ चलती है।

‘केवट’ शंकर नाम के एक नाविक की कहानी है, जो एक आपराधिक हादसे में अपनी पत्नी को खो देता है. जगह-जगह धक्के खाने के बावजूद उसकी कहीं सुनवाई नहीं होती. फिर उसे वीआईपी फ्लीट में नौका खेने का एक खास मौका मिलता है. उसकी नाव खेने की दक्षता पर मुग्ध होकर डीआईजी साहब पर्सनली उसे यह जिम्मा सौंपते हैं।


आयोजन का दिन आते-जाते वह प्रभु से वरदान मांगने के कितने ही ख्याल बुन लेता है. उसका श्रद्धा भाव इतना गहरा है कि वह इस युग के प्रभु-वर्ग से त्रेता वाली उम्मीदें रखता है. लेकिन उसकी आशा के विपरीत नए प्रभु एकदम नए फैशन के निकलते हैं. इतने दिनों की उसकी तपस्या पल भर में स्वाहा हो जाती है, कितने-कितने वरदान सोचे थे उसने।

संग्रह की अंतिम कहानी ‘न्योलि’ में दो सहपाठी बीस साल के लंबे अंतराल के बाद मिलते हैं. नायक विवाहिता को देखकर सोचता है, ‘तुम बरसों से मेरे मन में बीस-बाईस बरस की सुंदर चंचल लड़की के रूप में मौजूद थी, तुम्हें इस रूप में बदलने का हक किसने दिया.’
छात्र-जीवन में नायिका ने उसे न्योलि (नवेली दुल्हन का वह भावुक गीत, जिसमें उसका पति विवाह के दूसरे ही दिन कामकाज के लिए दूर देश निकल जाता है) सुनाई थी. सनसेट पॉइंट पर नायक ने वह मर्मस्पर्शी न्योलि सुनी थी।


दोनों के अपने-अपने परिवार हैं. दोनों में खतो-खिताबत चलती है, लेकिन सुमन की चिट्ठी पढ़कर वह सोचता है, मन का कोश भाषा से जरूर भर गया था, मगर अनुभूतियां कहीं पीछे छूटती चली गई. जैसे भाषा के भार से भावनाएं दब-पिसकर दम तोड़ चुकी हों.
कुछ अरसे बाद विवाहिता सुमन नैनीताल आती है और उसी सूर्यास्त-स्थल पर फिसलकर एक हादसे में दम तोड़ देती है.
नायक उसके अंतिम दर्शन करता है. उसे वह एक दुल्हन की तरह तरोताजा लगती है, जैसे सूर्य के रथ पर बैठकर सूर्य की अर्धांगिनी के रूप में न्योलि जा रही हो. कहानी में लोक-संस्कृति के साथ कुदरत का सांगोपांग वर्णन हुआ है।

कथा-संग्रह का नाम: अनाथ मुहल्ले के ठुल-दा
कथाकार: बटरोही
प्रकाशन: समय साक्ष्य
मूल्य: ₹135

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