हल्द्वानी- एडवांस तकनीक से हल्द्वानी के तीन मरीजों का हुआ दुर्लभ इलाज

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मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर केयर वैशाली ने गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोगों और कैंसर पर जागरूकता सत्र आयोजित किया

25 अगस्त, 2022, हल्द्वानी. गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर के मामलों में आजकल काफी वृद्धि देखने को मिल रही है. इसी को ध्यान में रखते हुए मैक्स इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर केयर वैशाली (गाजियाबाद) ने आज यहां जनजागरुकता कार्यक्रम का आयोजन किया और लोगों को इलाज के नए-नए तरीकों और नई टेक्नोलॉजी के बारे में जानकारी दी गई.

इस पब्लिक अवेयरनेस सेशन को मैक्स इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर केयर वैशाली में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल एंड एचपीबी सर्जिकल ऑनकोलॉजी के डायरेक्टर डॉक्टर विवेक मंगला ने संबोधित किया. साथ ही यहां तीन ऐसे मरीज भी मौजूद रहे जो कोलोन कैंसर, लिवर कैंसर और पैनक्रिएटिक ट्यूमर समेत अन्य बीमारियों से ग्रसित रहे हैं.

करीब 6 महीनों से ज्यादा तक भूख न लगने और गंभीर पेट दर्द की समस्या से पीड़ित रहे एक 60 वर्षीय मरीज के बारे में डॉक्टर विवेक मंगला ने बताया, ”मरीज को 6 महीने से भी ज्यादा वक्त बहुत ही सीरियस पेट दर्द था, उन्हें तत्काल इंजेक्टेबल मेडिसिन की जरूरत थी. मरीज का वेट लॉस भी हो रहा था और उन्हें खाने-पीने में भी समस्या होती थी. मरीज ने हल्द्वानी के एक स्थानीय अस्पताल में जब चेकअप्स कराए गए तो पैनक्रियाज़ में कैंसर का शक हुआ. मामले की गंभीरता को देखते हुए मरीज को तुरंत मैक्स इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर केयर वैशाली में सर्जरी के लिए भर्ती कराया गया. डॉक्टर्स की टीम ने व्हिपल सर्जरी और 40 मिमी मास हटाया जो पैनक्रिएटिक डक्ट, बाइल डक्ट और ड्यूडीनम में बाधा बन रहा था और इससे गंभीर दर्द होने के साथ ही भूख कम लग रही थी और मरीज का वजन घट रहा था. सर्जरी सफल रही और एक हफ्ते के भीतर ही मरीज अस्पताल से डिस्चार्ज हो गया, तुरंत ही पेशंट की रिकवरी भी होने लगी. अब पेशंट के अंदर कैंसर का कोई लक्षण नहीं है.”

यानी जो मरीज गंभीर दर्द से जूझ रहा था और जिसे अलग-अलग अस्पतालों में दिखाने के बाद भी राहत नहीं मिल रही थी, वो अब सामान्य जीवन गुजार रहा है और रोजमर्रा के अपने काम कर रहा है. साथ ही सर्जरी के बाद उनका वेट भी बढ़ने लगा है.

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हल्द्वानी से ही कैंसर का एक और केस मैक्स कैंसर सेंटर में आया. 72 वर्षीय लक्ष्मण एक रिटायर्ड ऑफिसर हैं, और उन्हें शुरुआती स्टेज का लिवर कैंसर पाया गया. उनके लिवर के दाएं हिस्से में कैंसर था जो मेन पोर्टल वेन तक बढ़ गया था. मरीज की कंडीशन देखकर लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प नजर आ रहा था लेकिन परिवार ने उनकी उम्र और रिस्क को देखते हुए ऐसा नहीं कराया. इसके बाद मैक्स इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर केयर वैशाली के ट्यूमर बोर्ड में केस पर चर्चा की गई और ट्रांस आर्टेरियल कीमो एंबोलाइजेशन (TACE) के जरिए इलाज शुरू किया गया. TACE के बाद SBRT किया गया.

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डॉक्टर विवेक मंगला ने बताया, ”ट्रांस आर्टेरियल कीमो एंबोलाइजेशन (TACE) वो प्रक्रिया है जिसमें कीमियोथेरेपी के साथ एंबोलाइजेशन किया जाता है. ये तरीका मुख्यत: लिवर कैंसर के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है. इसमें मरीज को एंटी-कैंसर दवाइयों के साथ एंबोलिक एजेंट्स के इंजेक्शन दिए जाते हैं जो ब्लड के जरिए सीधे कैंसर की जगह पहुंचते हैं. कैंसर को खत्म करने और कमजोर करने लिए इलाज का ये तरीका बहुत ही कारगर रहता है और लिवर फिर से ठीक से काम करने लगता है और जीवन बेहतर बनता है.”

लिवर कैंसर के इलाज में TACE/TARE प्रक्रिया SBRT के साथ या उसके बिना भी कारगर साबित होती है. ये उन मरीजों के लिए होता है जिन्हें सर्जरी नहीं की जाती है.

ऊपर बताए गए दो मरीजों के जैसे ही कैंसर के एक मरीज मैक्स कैंसर सेंटर पहुंचे थे. ये हैं नैनीताल के 55 वर्षीय हिम्मत सिंह, जिन्हें कोलोन कैंसर था. हिम्मत सिंह को लगातार कमजोरी और वजन घटने की समस्या हो रही थी, जिसके बाद उनका कोलोनोस्कोपिक टेस्ट किया गया. मरीज को डायबिटीज थी और उनकी लैप्रोस्कोपिक कोलसिस्टेक्टोमी की भी समस्या रही थी.

डॉक्टर विवेक मंगला ने इस मरीज के बारे में बताया, ”मैक्स अस्पताल वैशाली में इसी साल अप्रैल के महीने में मरीज का इलाज किया गया. इंट्राकॉर्पोरियल इलियोट्रांवर्स एनासटोमोसिस के साथ उनकी लैप्रोस्कोपिक हेमिकोलेक्टोमी सर्जरी की गई. सर्जरी के सात दिन के अंदर ही मरीज को डिस्चार्ज कर दिया गया. मरीज की फाइनल बायोप्सी में T2 लेसियंस के साथ राइट कोलोन कैंसर पाया गया था. क्योंकि कैंसर का पता शुरुआती स्टेज में लग गया था इसलिए मरीज की कीमोयोथेरेपी नहीं की गई. लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के बाद मरीज को पेन नहीं होता है और बहुत ही आराम से रिकवरी हो जाती है. अब मरीज की हालत बहुत अच्छी है और वो अपने रोजमर्रा के काम कर पा रहे हैं.”

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गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर जीआई ट्रैक्ट को प्रभावित करते हैं, इससे पाचन तंत्र समेत पेट की अन्य समस्याएं भी होने लगती हैं. इसका असर पेट, दोनों आंत, लिवर, गॉल ब्लैडर, पैनक्रियाज़, खाने की नली आदि पर होता है. ये कैंसर अल्सर के रूप में पेट के अंदर किसी भी अंग से पैदा हो सकते हैं और शरीर के दूसरों हिस्सों में फैल सकते हैं और पता भी नहीं चल पाता. इन्हीं बातों के मद्देनजर मैक्स हेल्थकेयर ये कहता है कि लोगों को अपनी बीमारी के प्रति बहुत सचेत रहने की जरूरत है. छोटी से छोटी समस्या होने पर चेकअप्स कराएं, रेगुलर चेकअप्स कराते रहें ताकि बीमारी का शुरुआती स्टेज में ही पता चल सके. देर से बीमारी का पता चलने पर न सिर्फ मरीज के ठीक होने के चांस कम रहते हैं बल्कि इलाज का खर्च भी बढ़ जाता है.

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