गढ़वाल: चायवाली अंजना — अभावों से भरा जीवन एवं कम उम्र में मिली जिम्मेदारियां व्यक्ति को जो सीख देती हैं उसे जीवन की कोई पाठशाला नहीं दे सकती है। अभावों एवं जिम्मेदारियों से भरी जीवन की इसी पाठशाला से बनी एवं तपी है वीरांगना तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित 34 वर्षीय अंजना रावत। जिनके संघर्षों की कहानी समाज को प्रेरणा देती है।
अंजना वजीरों का बाग ओल्ड पीएनबी रोड पर एक छोटी सी चाय की दुकान चलाती हैं। 2011 तक उसके पिताजी स्वर्गीय गणेश सिंह इस दुकान को चलाते थे। जिससे किसी तरह से उनके पांच लोगों के परिवार का खर्चा चलता था। अभावों से बाहर आने की छटपटाहट के साथ अंजना की कॉलेज लाइफ शुरु हुई। परिवार एवं जिंदगी को नई दिशा देने के सपने उसने देखने शुरु कर दिए थे। लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। साल 2010 में उसके पिताजी को गले का कैंसर हो गया। पिताजी अस्पताल पहुंच गए। नियति ने अंजना का संघर्ष और कठिन कर दिया। परिवार के लिए अंजना ने चाय की दुकान में बैठना शुरु कर दिया। कॉलेज पड़ने वाली लड़की के लिए चाय की दुकान चलाना आसान नहीं था।
साल 2011 में उसके पिताजी जिन्दगी की जंग हार गए। लेकिन अंजना नहीं हारी। उसने चाय की दुकान के साथ साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। समाज शास्त्र में एमए किया, एवं एम एस डब्ल्यू का डिप्लोमा भी हासिल किया।
अंजना कम उम्र में पहाड़ सी जिम्मेदारियों को बखूबी संभाला है। पिताजी की मृत्यु के बाद उन्होंने अपनी बड़ी बहिन की शादी एवं छोटे भाई को अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनाया।
अंजना के जीवनीय संघर्ष को सलाम करते हुए राज्य सरकार ने उसे 2020 में वीरांगना तीलू रौतेली पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। इसके अलावा समय समय पर विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी सम्मानित किया।
कम उम्र में जीवन का एक बड़ा हिस्सा परिवार को देने के बाद, अब अंजना राजनीति के माध्यम से समाज सेवा में आगे बढ़ना चाहती है।

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