देहरादून : उत्तराखंड में इस साल जुलाई से उत्तराखंड मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने राज्य में मदरसा शिक्षा व्यवस्था बदलते हुए सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अधीन कर दिया है। अब मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक स्कूलों को प्राधिकरण द्वारा तय पाठ्यक्रम ही पढ़ाना होगा और उन्हें उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी।
सरकार का कहना है कि यह कदम इसलिए जरूरी था क्योंकि कई मदरसे बिना अनुमति के चल रहे थे। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ मदरसों में हिन्दू बच्चों को भी मजहबी शिक्षा दी जा रही थी। ऐसे 227 अवैध मदरसे पहले ही बंद कराए जा चुके हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि अब अल्पसंख्यक बच्चों को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षा मिलेगी। इससे बच्चों का भविष्य सुधरेगा और वे देश-दुनिया से जुड़ पाएंगे।
प्राधिकरण का गठन
उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण में 12 सदस्य शामिल हैं। इसके अध्यक्ष प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी हैं। सदस्यों में मुस्लिम, जैन, ईसाई, बौद्ध और सिख समुदाय के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। प्राधिकरण का काम यह तय करना होगा कि बच्चों को उनके धर्म के अनुसार कौन-सी शिक्षा दी जाए। बाकी पाठ्यक्रम उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के अनुसार पढ़ाया जाएगा।
सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने कहा कि प्राधिकरण अल्पसंख्यक बच्चों की शिक्षा सुधारने के लिए बनेगा। बच्चों को उनके धर्म की शिक्षा दी जाएगी, बाकी पाठ्यक्रम राज्य शिक्षा बोर्ड के अनुसार होगा।
मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया
मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष शमूम कासमी ने कहा कि यह कदम स्वागत योग्य है…अब बच्चे राष्ट्रीय पाठ्यक्रम पढ़ेंगे और दुनिया से जुड़ेंगे। वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने कहा कि मदरसे अब नए जमाने के शिक्षण संस्थानों में बदलेंगे और अल्पसंख्यक बच्चों की शिक्षा में सुधार होगा।
अल्पसंख्यक आयोग की उपाध्यक्ष फरजाना बेगम ने कहा कि अब हमारे बच्चे भी अच्छी शिक्षा पाएंगे और देश-दुनिया में नौकरी और कारोबार के अवसर बढ़ेंगे।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कि पहले यह नहीं पता था कि मदरसों में क्या पढ़ाया जा रहा है, कौन पढ़ा रहा है और फंडिंग कैसे हो रही है। जांच में कई अनियमितताएं सामने आईं। अब 200 से ज्यादा अवैध मदरसे बंद कर दिए गए हैं। सरकार ने फैसला लिया है कि अब अल्पसंख्यक बच्चों को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षा मिलेगी। अब मुस्लिम के साथ-साथ जैन, सिख, ईसाई और पारसी बच्चों को भी समान अवसर मिलेंगे।

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