ग्वाला शब्द ही पहाड़ के हर उस पहाड़ी के मन में अपना बचपन लौटा लाता है जो वह सुविधाओ के अभाव में जिया जाने वाला पहाड़ में पहाड़ सा जीवन से निकलकर आधुनिकता की मंडी स्थापित हुआ हो, ग्वाला यानी रक्षक, मूलतः पहाड़ में पालतू पशुओं को बिचरण के लिए जंगलों में ले जाया जाता है, वह पशु जिसमे गाय, भैस, बकरियां आदि मुख्य रूप से होती है, सभी पालतू पशु जंगल में भर पेट चारा खा सके उस समय जंगली जानवरों से अपने पशुओं का रक्षक को ही ग्वाला के नाम से जाना जाता है। पहाड़ के बचपन में ग्वाला का बड़ा ही महत्व माना गया है क्योंकि हर उस पहाड़ी ग्वाले में भगवान श्री कृष्ण में अंश दिखने लगता है।

जिस तरह भगवान कृष्ण द्वारा नटखट अदाओं से ग्वाले को विशेष माना गया उसी तरह पहाड़ का ग्वाला अपनी अद्भुद कलाओं से निपूर्ण होता है। स्कूल की छुट्टी होने के बाद घर पहुँचते ही जल्दीबाजी का भोजन ग्रहण कर अपने साथ भोटिया प्रजाति का निडर कुत्ता साथ लेकर अपने जानवरो को हांक कर जंगल को बढ़ चलता है। फिर जंगल में अगल बगल गाँव के ग्वाले इक्कठा होकर अपने खेलो में व्यस्थ हो जाते है अब उनके जानवरो की रक्षा यानी जानवरो का ग्वाला भोटिया कुत्ते करने लगते है। स्कूल की मंडली अब जंगल में मिलने के बाद स्कूल के बातों के अलावा अलग अलग तरह के कारनामे किया करते है, वह पारम्परिक खेलो के साथ साथ लोकगीत, लोकनृत्य के अलावा जागर में हंसी ठिठोली के साथ अपने बचपन को यादगार बनाने में जुटे रहते है।

जब पिता, ताऊ, चाचा, बूबू अपने जमाने के किस्से सुनाने शुरू करते हैं तो उसमें ग्वाला का जिक्र भी जरूर आया करता है यानी पहाड़ के जीवन में ग्वाले की अहम भूमिका है। ग्वाला ही पहाड़ी बच्चो के चहुमुखी विकास की पहली सीढ़ी मानी जाती है, वाद विवाद के साथ साथ काफी ऐसी प्रतियोगिताएं ग्वाले से ही शुरू होती थी क्योंकि जंगल में एकांत के साथ साथ कुछ भी करने की आजादी महसूस होती है। ग्वाले जाकर ही बच्चों के बीच एक निपूर्ण तैराक के साथ साथ अचूक निशानेबाज बनते देखे है। ग्वाला पहाड़ के बच्चो को आत्मनिर्भरता और दूसरों से बेहतर बनाने की पाम्परिक कला है।
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