वो जो देखा था हमने एक सपना… कि कैसा होगा अलग प्रदेश अपना…

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वो जो देखा था हमने एक सपना…
कि कैसा होगा अलग प्रदेश अपना…
वो सपना रोज़ टूटता हैं…
जब गाँव किसिका छूटता है….
जब मजबूरियाँ किसी को खींचती है…
और बूढ़ी आँखें चीखती है …
पर ज़ुबान ख़ामोश ही रहती है …
बस भली के जाया वो कहती है…
फिर जवानी नीचे भागती है…
और बुढ़ापा ऊपर बैठा बस राह तकता है…
कभी देहली पे ऐपण बनती थी
अब दरवाज़ों पे ताला लटकता है….

जिस राज्य के लिए बलिदान दिये थे
वो आज जंगल में बदल रहा है …
हो सके तो उठ जाओ
वक्त हाथ से फिसल रहा है..

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जन्म दे भले ही पहाड़ नदी को
पर नदी पहाड़ को छोड़ती है…
जो सपना देखा था हमने
उसे हक़ीकत रोज़ तोड़ती है….

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