नेपाल के बाद उत्तराखंड की बारी? ग्लेशियर झीलों को लेकर वैज्ञानिकों ने बताई सबसे बड़ी चिंता

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देहरादून। नेपाल में हालिया आपदा के बाद उत्तराखंड की आपदा तैयारियों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। हिमालयी राज्य होने के कारण उत्तराखंड में ग्लेशियर, ग्लेशियर झील, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बना रहता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी ग्लेशियर झील में अचानक हलचल होती है तो क्या इसकी जानकारी समय रहते नीचे रहने वाले लोगों तक पहुंच पाएगी?

विशेषज्ञों के मुताबिक उत्तराखंड और नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों में भौगोलिक समानताएं हैं। उत्तराखंड पहले भी केदारनाथ आपदा, रैणी-तपोवन घटना और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुका है। इन घटनाओं ने साफ किया है कि ऊपरी हिमालय में होने वाली कोई भी बड़ी घटना कुछ ही समय में निचले इलाकों को प्रभावित कर सकती है।

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उत्तराखंड में चिन्हित हैं करीब 1200 झीलें

ग्लेशियर क्षेत्र की मैपिंग के दौरान उत्तराखंड के हिमालयी हिस्से में करीब 1200 अलग-अलग प्रकृति की झीलों को चिन्हित किया गया था। इनमें कुछ अस्थायी ग्लेशियर झीलें हैं, जबकि कुछ झीलें प्राकृतिक बांध यानी मोरेन से बनी हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार मोरेन डेम वाली झीलों में खतरा ज्यादा हो सकता है। यदि प्राकृतिक बांध टूटता है तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की घाटियों की ओर बढ़ सकता है।

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सरकारी स्तर पर भी कुछ झीलों को हाई रिस्क श्रेणी में रखा गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन झीलों की लगातार निगरानी और रियल टाइम अलर्ट सिस्टम बेहद जरूरी है।

सेंसर और अलर्ट सिस्टम की जरूरत

ग्लेशियर झीलों में पानी का स्तर, आसपास की जमीन, लीकेज और दूसरी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सेंसर लगाए जा सकते हैं। इनसे मिलने वाली जानकारी के आधार पर खतरे का शुरुआती संकेत मिलने पर नीचे के क्षेत्रों में अलर्ट जारी किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि पहले किसी एक हाई रिस्क झील को मॉडल प्रोजेक्ट के तौर पर लेकर वहां सेंसर, संचार और चेतावनी प्रणाली विकसित की जाए। सफल होने पर इसे दूसरी संवेदनशील झीलों तक बढ़ाया जा सकता है।

सिर्फ ग्लेशियर झील नहीं, नदियां भी चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में खतरा केवल ग्लेशियर झीलों तक सीमित नहीं है। ऊपरी क्षेत्रों में ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन या नदी के अचानक बढ़ने जैसी घटनाएं भी नीचे बसे इलाकों के लिए खतरा बन सकती हैं।

ऐसे में नदियों के ऊपरी हिस्सों से लेकर डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों तक सेंसर नेटवर्क तैयार करने की जरूरत बताई जा रही है। इससे नदी के व्यवहार में अचानक बदलाव की जानकारी जल्द मिल सकती है…और लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचने का समय मिल सकता है।

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नदी किनारे निर्माण पर भी उठे सवाल

विशेषज्ञों ने नदियों के किनारे बसे क्षेत्रों को लेकर भी सावधानी बरतने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि पिछली बड़ी बाढ़ के स्तर के आधार पर बाढ़ प्रभावित क्षेत्र चिन्हित किए जाने चाहिए।

इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किन इलाकों में निर्माण करना जोखिम भरा हो सकता है। साथ ही लोगों को पहले से यह जानकारी मिल सकेगी कि बड़ी बाढ़ की स्थिति में पानी किस क्षेत्र तक पहुंच सकता है।

सरकार की तैयारी क्या है?

आपदा प्रबंधन विभाग का कहना है कि राज्य में आपदा से निपटने के लिए मॉक ड्रिल, प्रशिक्षण और जनजागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। जिलों के लिए आपदा प्रबंधन योजनाएं भी तैयार की गई हैं।

मौसम संबंधी चेतावनियों के लिए सचेत ऐप और भूकंप से जुड़ी चेतावनी के लिए भू-देव जैसे प्रयासों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि ग्लेशियर झील से अचानक बाढ़ यानी GLOF की रियल टाइम चेतावनी व्यवस्था को अभी और विकसित किए जाने की जरूरत बताई गई है।

ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेंसर लगाना आसान नहीं

हाई रिस्क ग्लेशियर झीलों की निगरानी में सबसे बड़ी चुनौती उनका दुर्गम और अत्यधिक ऊंचाई वाला क्षेत्र है। यहां सेंसर लगाने के साथ उन्हें लंबे समय तक चालू रखना, ऊर्जा की व्यवस्था करना और उनसे मिलने वाला डेटा नीचे तक पहुंचाना आसान नहीं है।

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सैटेलाइट कम्युनिकेशन एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसकी लागत और तकनीकी चुनौतियां भी हैं। अत्यधिक ठंड और खराब मौसम भी ऐसे सिस्टम के संचालन को प्रभावित कर सकते हैं।

पुरानी घटना से भी मिलती है बड़ी सीख

विशेषज्ञों ने करीब डेढ़ सौ साल पुरानी अलकनंदा घाटी की एक घटना का उदाहरण देते हुए बताया कि उस दौर में भी संभावित बाढ़ की चेतावनी के लिए लंबी दूरी तक संचार व्यवस्था तैयार की गई थी।

आज तकनीक काफी आगे बढ़ चुकी है। सैटेलाइट, सेंसर, मोबाइल अलर्ट और रियल टाइम डेटा जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में इन्हें एक मजबूत और आपस में जुड़े अर्ली वार्निंग सिस्टम में बदलने की जरूरत है।

आपदा से पहले चेतावनी सबसे जरूरी

उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन समय रहते खतरे की जानकारी मिलने से जनहानि को काफी कम किया जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिक निगरानी, सेंसर नेटवर्क, मोबाइल अलर्ट, सायरन सिस्टम और स्थानीय प्रशासन को एक साथ जोड़ना जरूरी है।

नेपाल की घटना उत्तराखंड के लिए भी एक चेतावनी मानी जा सकती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगली बड़ी आपदा आने से पहले क्या राज्य अपने अर्ली वार्निंग सिस्टम को पूरी तरह जमीन पर उतार पाएगा?

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