- सिनेमा का शौक और शब्दभेदी वरदान
- लेखक ललित मोहन रायल आईएएस
उस समय फिल्मों का इतना क्रेज हुआ करता था कि लड़के खुद को रोक नहीं पाते थे। किसी भी छत पर वीसीआर पर एक ही रात में तीन-तीन फिल्में दिखाई जातीं। मार्च में परीक्षाएं निबटने के बाद लड़के बिंदास हो जाते। रात को छत पर सोना होता था। आबादी विरल थी। चार-पांच किलोमीटर के रेडियस तक की आवाज आराम से सुनाई पड़ जाती। फिल्मी डायलॉग का एक भी कतरा कान में पड़ा नहीं की नौजवान चौकन्ना हो जाता।
वीसीआर कहां लगा है, का पता लगाने का प्रवीण भाई ने एक अलहदा सिस्टम डिवेलप किया हुआ था। निचाट रात में हवा के झोंके के सहारे आवाज उसके कान में पड़ी नहीं कि वह घर से बाहर निकलता और जमीन में कान लगाकर तरंगों के सहारे अनुमान लगाने की कोशिश करता। जीवशास्त्री बताते हैं कि रेंगने के दौरान सांप जमीन के कंपन से ध्वनि को महसूस करता है। तो प्रवीण भाई अनुमान के सहारे आवाज के स्रोत तक पहुंचने की कोशिश करता। घर से निकलकर वह नेपाली फार्म के बंधे के पास फिर से जमीन में कान लगाकर खुद को दुरुस्त करता। पता लगाने की कोशिश करता कि वीसीआर टिहरी फार्म में लगा है या नेपाली फार्म में। उस जंक्शन पर ध्वनि तरंगों के सहारे वह मालूमात पुख्ता कर लेता कि अरे! ये तो नंबरदार फार्म में लगा है। फिर खुशी-खुशी उधर का रास्ता पकड़ लेता।

भैंसाबग्घी वाले करणपाल के पड़ोस में पांडे या गोविंद की छत पर अक्सर वीसीआर लगा करता था। करणपाल उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि मेरे पास टिकट के लिए एक रुपया भी नहीं होता था लेकिन शौक तो शौक है। उसके लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। फिल्म तो देखनी ही थी। उसका उन्होंने यह रास्ता ढूंढा हुआ था कि छत के पीछे मौजूद कटहल के पेड़ पर चढ़कर वह एक सांस में तीनों फिल्में देख डालता।
किसी एक शादी में तो वीसीआर के आगे बच्चों का मजमा लगा हुआ था। मोर- मुकुट,सेहरा बांधे दूल्हा फिल्म देखने के लिए इतना उतावला था कि शादी की जरूरी रस्में छोड़कर वो बच्चों को धौंस दे रहा था कि मैं दूल्हा हूं। मुझे पिक्चर देखने दो।


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